सोशल मीडिया डिक्टेटेड रिएलिटी : सपनों के सब्ज़बाग़ और कमिटमेंट फ़ोबिया


सोशल मीडिया डिक्टेटेड रिएलिटी  सपनों के सब्ज़बाग़ और कमिटमेंट फ़ोबिया


स्मार्टफ़ोन और एडिटिंग ऐप्स की मेहरबानी से सब अपने-अपने वर्चुअल स्पेस के सितारे हैं. सब ख़ुश नज़र आते हैं और सबकी ज़िंदग़ी ख़ूबसूरत दिखती है.

यही देख-सुनकर बड़े हो रहे युवाओं के सपनों को 'सब्ज़बाग़' बनते देर नहीं लगती.  हर तरफ़ से होती लाइक्स, तारीफ़ों की बारिश और लगातार मिलता अटेंशन किसी के भी दिमाग़ को सातवें आसमान पर पहुंचा सकता है.

ऐसे में 'परीकथा' के पीछे भाग रही सोशल मीडिया वाली पीढ़ी को 'यूं ही' किसी पर 'सेटल' होना, टिकना मुश्किल लगता है.

डॉक्टर भी मानते हैं कि सोशल मीडिया एक दोधारी तलवार है, "हर कोई एक वर्चुअल रिएलिटी यानी आभासी असलियत में जी रहा है. हम इसे सोशल मीडिया डिक्टेटेड रिएलिटी कहते हैं जिसमें सपने ही फॉल्स अज़म्पशन यानी दिखावे के आधार पर बुन लिए जाते हैं."

किसी भी रिश्ते को बनाने-बढ़ाने के लिए ईमानदारी से समय देना भी एक बड़ी चुनौती है, समय मिल जाए तो नीयत होनी भी ज़रूरी है.

न्यूक्लियर परिवारों में पले बहुत से बच्चों की दुनिया सिर्फ़ उनके इर्द-गिर्द घूमती है, किसी रिश्ते के लिए समझौते करना, परेशानी उठाना या किसी और की ज़रूरतों को ख़ुद पर तरज़ीह देना उन्हें अखरता है.

डॉक्टर भी इस राय से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, "सब अपने बारे में सोच रहे हैं. कोई किसी और के हिसाब से ज़िंदग़ी नहीं जीना चाहता. लड़के हों या लड़कियां आजकल सभी महत्वाकांक्षी हैं और मानते है  कि अपने पैरों पर खड़ा होना उनकी पहली प्राथमिकता है. ऐसे में दहेज, शादी, बच्चे, ये उन्हें झमेले भी लग सकते हैं. "


कभी-कभी यही कमिटमेंट फ़ोबिया को जन्म देता है.


बीबीसी से साभार - http://www.bbc.com/hindi

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